ऐ मन, तू उदास क्यों है?
क्या बारिश की ये बूँदें सुकून नहीं देतीं?
या कीचड़ से डर लगता है?
बादल आएँगे तो बारिश भी होगी,
भीगने की गुँजाइश भी होगी।
भीगेगा बदन, कीचड़ की नुमाइश भी होगी,
पर दिल को सुकून मिलेगा, ख़्वाहिश पूरी होगी।
फिर क्यों डरता है कीचड़ से?
क्या ये डर लोगों का है
या उनसे मिले अश्कों का?
मैं उदास नहीं, ख़ामोश हूँ,
बरसात में मदहोश हूँ।
कीचड़ से डर लगता है, ना जाने क्यों,
आँखों में बारिश रहती है, ना जाने क्यों।
ज़रूरी नहीं कि बादल आएँ और बारिश भी हो,
भीगने की कोई गुँजाइश भी हो।
ना बदन भीगे, ना सुकून मिले,
सिर्फ़ भीगने के जुनून की नुमाइश ही हो।
सुकून भी ना मिले, ख़्वाहिश भी पूरी ना हो,
फिर क्यों ना डरे मन भीगने से?
डर ज़माने से नहीं,
उससे मिले अश्कों का है।
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