वो आए और आकर हमसे रूठ गए
ख्यालो में बसे घरोंदे जैसे टूट गए
होंठ कांपे मगर कुछ कह ना सके
लफ़्ज़ होंठों तक आए मगर छूट गए
-महेश माही"
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