अब नहीं मिलोगी
घर पर,घर की गूँज में,
नहीं मिलोगी
श्मशान की आग में।
शरीर जल चुका है
तो राख में भी नहीं मिलोगी,
जो अस्थियां विसर्जित हुयीं
उन अस्थियों में नहीं रहोगी।
जितनी दूर ढूंढूंगा
वहाँ भी नहीं पाऊँगा,
जब तक रहूँगा
मन से चिपका पाऊँगा।
संदर्भ में बार-बार आ
घर को पकड़ लोगी,
मेरी योग्यता-अयोग्यता पर चुप हो
विषयांतर कर दोगी।
जब तक रहूँगा
टँगी मिलोगी चुपचाप
सपनों के पेड़ पर,
लौटना मुझे भी है
सब सुख-दुख पीछे छोड़कर।
- महेश रौतेला
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