आतंकी हर अंधियारे से आज समय है लड़ना होगा,
जो चारण तम के बन बैठे उन्हें तमाचा जड़ना होगा।
दूर अभी है भोर बहुत तुम बिना रुके बस चलते रहना।
एक दीप अगर जल जाए तो फिर दीपक कई जलेंगे।
कलुषित अंधकार के प्रेमी आखिर केवल हाथ मलेंगे|
चाहे जितनी चलें आंधियां गिर-गिर मगर संभलते रहना।
उजियारा जीवन का द्योतक और अंधेरा मरण हुआ है
धीरे धीरे मूल्य मर रहे अपनेपन का क्षरण हुआ है
जहां कहीं भी मिले निराशा उसको सदा मसलते रहना।
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X