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गिरके पलकों से बिखर जाएँगे हम भी अंजुम

                
                                                         
                            ज़ुल्फ़-ए-ख़मदार से यूँ रुख़ न छुपाओ जानाँ
                                                                 
                            
तालिब-ए-दीद हूँ दीदार कराओ जानाँ

तिश्ना-लब आपकी महफ़िल में हैं बैठे कब से
चश्म-ए-उल्फ़त से ज़रा हमको पिलाओ जानाँ

रात-दिन ज़ुल्म की बरसात करो हो हम पर
क्या ये दस्तूर-ए-मोहब्बत है बताओ जानाँ

ख़ाक-ए-पा-ए-रह-ए-उल्फ़त है मुक़द्दर अपना
सर-ए-तसलीम है जो चाहो बनाओ जानाँ

कुश्ता-ए-तेग़-ए-अदा कब से पड़े आपके हैं
ख़ून-ए-नाहक़ का न इल्ज़ाम उठाओ जानाँ

उम्र गुज़री है इसी कुंज-ए-तमन्ना में, हमें,
अब किसी और ठिकाने न लगाओ जानाँ

सोज़-ए-फ़ुर्क़त में पिघलती है मेरी शमअ-ए-हयात
आतिश-ए-हज्र को अब आके बुझाओ जानाँ

गिरके पलकों से बिखर जाएँगे हम भी अंजुम
टूटते तारों से अब हमको मिलाओ जानाँ


 
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एक घंटा पहले

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