तुम चले आना दिल्ली
जिस दिन तुम्हें लगे
कि मेरे शब्दों में पहले-सी गर्मी नहीं रही,
और प्रेम ने मेरी आवाज़ से इस्तीफ़ा दे दिया है।
तुम चले आना
जिस दिन तुम्हें लगे
कि मैं भीड़ की तालियों में
अपना सच खोने लगा हूँ।
तुम चले आना दिल्ली
जब तुम्हें लगे
कि मैं ज़माने से आगे निकलने की दौड़ में,
तुम्हारे साथ चलना भूल गया हूँ।
जिस दिन लगे
कि मेरे भीतर का आदमी
मेरे ही बनाए हुए विचारों से हार रहा है,
उस दिन किसी बहस की नहीं,
मेरे इस्तीफ़े की माँग करना।
समाज से नहीं,
सरकार से नहीं,
किसी मंत्री से नहीं—
मेरे अहंकार से जवाब माँगना।
और अगर कभी तुम्हें लगे
कि मेरे प्रेम में न्याय नहीं बचा,
कि तुम्हारी ख़ामोशियाँ
मेरे शब्दों से छोटी पड़ गई हैं,
तो तुम चले आना दिल्ली...
किसी धरने की तरह नहीं,
एक अंतिम उम्मीद की तरह।
मैं तुम्हारे सामने
अपने सारे तर्क रख दूँगा,
तुम बस इतना कहना—
"अब अपने अहंकार से इस्तीफ़ा दे दो...
ताकि हमारा प्रेम बचा रहे।"
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