साँप डसता है ज़हर से, आदमी लफ़्ज़ों से वार करता है,
साँप तो सामने आता है, आदमी अपनों में छिपकर वार करता है।
साँप की फितरत में बस भूख है, नफ़रत का व्यापार नहीं,
इंसान से बड़ा ज़हरीला कोई जीव इस संसार में नहीं।
ललित दास ‘निर्मोही’ ने सच कहा—फ़र्क़ बस इतना सा है,
साँप काटे तो ज़ख्म मिलता है, आदमी काटे तो रिश्ता मरता है।
साँप से बचने को लोग ज़हर पहचान लेते हैं,
आदमी का ज़हर पीकर भी लोग उसे अपना मान लेते हैं।
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