"सत्ता का फार्महाउस"
फेसबुक और व्हाट्सएप पर,
दावों की लंबी कतारें हैं,
हर दीवार पर चस्पां यहाँ ,
भावी नेताओं के नारे हैं।
हर घर से अब गूँज रहा है,
भावी सांसद का नारा,
लगता है, हर मज़दूर यहाँ पर,
बनने को बैठा युवराज हमारा!
राजनीति को इन लोगों ने,
दद्दा का फार्महाउस समझ लिया,
पाने को सिंहासन कुर्सी,
सारी ज़मीर को खरीद लिया।
लार टपकती है सत्ता के प्रति,
आँखों में लोभ का मेला है,
किन्तु बुद्धि के बियाबान में,
आज हर ज्ञानी अकेला है।
पोस्ट डालने से क्या सचमुच,
तकदीर देश की बदलती है?
या महज़ हवा में खोखले शब्दों से,
मूक आग जलती है?
पढ़े-लिखे कुछ मूर्ख चेहरे,
बस कोरे सपने बुनते हैं,
जनता की गाढ़ी मेहनत पर,
ये अपने महल चुनते हैं।
उठो! ज़रा इन मुखौटों को,
सच्चाई की धूप दिखाओ,
विकास महज़ पोस्टों का नहीं,
कर्मठ हाथों से लिखवाओ!
-लक्ष्मीकान्त शर्मा 'रुद्र'
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