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हिन्दी महिमा चालीसा

                
                                                         
                            :जय हिंदी जननी जग - माता।
                                                                 
                            
तुमसे गौरव भारत पाता।।१।।

जन - जन के मन की अभिलाषा।
हिन्दी भारत की परिभाषा।।२।।

दुःख में बनकर धीर बँधाती।
सुख में मधुर हँसी बरसाती।।३।।

माँ की ममता , स्नेहिल छाया।
हिंदी ने हर भाव सजाया।।१४।।

आँसू को भी अर्थ सिखाती।
सबके अधरों पर मुस्काती।।५।।

श्रमिकों के श्रम की परिभाषा।
जन - मन की तुम सच्ची आशा।।६।।

घर - आँगन की सहज कहानी।
तुमसे ही लगती पहचानी।।७।।

लोरी में बनकर रस ढलती।
बच्चों के सपनों में पलती।।८।।

यौवन में उत्साह जगाती।
बूढ़ी आँखों को सहलाती।।९।।

स्वर में मधुरिम गूँज तुम्हारी।
व्यंजन में है शक्ति सारी।।१०।।

गीतों में तुम सुर बन जाती।
कथ्य बने तो मन हरषाती।।११।।

भेद भुलाकर साथ निभाती।
मन से मन का सेतु बनाती।।१२।।

नहीं किसी से बैर तुम्हारा।
ज्ञान बने बस लक्ष्य हमारा।।१३।।

तुलसी , सूर , कबीर निराला।
मिलकर सब नें किया उजाला।।१४।।

मीरा की भक्ति में हिंदी।
भारत भाल चमकती बिंदी।।१५।।

दिनकर है हुंकार तुम्हारी।
हिंदी है पहचान हमारी।।१६।।

प्रेमचंद की कथा सँवारी।
ममतामयी भाषा है प्यारी।।१७।।

स्वर - व्यंजन का मेल निराला।
अक्षर - अक्षर दीपक माला।।१८।।

भारत का सम्मान तुम्हीं हो।
जन - मन की मुस्कान तुम्हीं हो।।१९।।

जाति - धर्म के भेद मिटाती।
प्रेम और सौहार्द जगाती।।२०।।

हिंदी का रथ शिखर चढ़ेगा।
विश्व - पटल पर मान बढ़ेगा।।२१।।

लेखक , कवि , विद्वान उचारें।
जग में हिंदी गीत तुम्हारे।।२२।।

राष्ट्र - प्रेम का भाव जगाओ।
निज भाषा का मान बढ़ाओ।।२३।।

जन - जन तुमको शीश नवाए।
हिंदी का गौरव नित गाए।।२४।।

हिंदी की ब्रज कहे कहानी।
'रुद्र' भाव रसधार पुरानी।।२५।।

अवधी में जग का रंग न्यारा।
रूप हिन्दी का सबसे प्यारा।।२६।।

राजस्थानी रंग निराला।
'रुद्र' मनोहर स्वर मतवाला।।२७।।

रिश्तों में अपनापन भरती।
मन की दूरी पल में हरती।।२८।।

जन-जन का विश्वास तुम्हीं हो।
भारत की मधुमास तुम्हीं हो।।२९।।

सरल व्याकरण हमें सिखाती।
अपनेपन का भान कराती।।३०।।

चौपालों की सहज कहानी।
हिंदी की है अमिट निशानी।।३१।।

घर - आँगन की सहज कहानी।
तुमसे ही लगती पहचानी।।३२।।

शिक्षा का माध्यम बन पाए।
'रुद्र' ज्ञान का दीप जलाए।।३३।।

वेदों में संस्कृत की धारा।
बहे मात बन रूप तुम्हारा।।३४।।

प्राकृत बनी लोक की बानी।
अपभ्रंशों से हिंदी जानी।।३५।।

जन-जन को संवाद सिखाती।
दूर बसे मन पास बुलाती।।३६।।

भाषाएँ सब फूल सुहाने।
हिंदी उनमें भाव जगाने।।३७।।

'रुद्र' कलम केवल यश गाए।
हिंदी का ही मान बढ़ाए।।३८।।

हिंदी शब्द नहीं बस भाषा।
इसमें बसती जन की आशा।।३९।।

जब तक साँस रहे इस तन में।
हिंदी गूँजे सबके मन में।।४०।।
 
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एक घंटा पहले

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