मौलिक सृजन
"बरगद के आँसू"
गाँव के आखिरी मोड़ पर
अब भी खड़ा है बरगद—
झुर्रियों से भरा चेहरा,
जड़ों में दबे हुए
सैकड़ों मौसमों के दस्तावेज़
और शाखों पर टँगे
बचपन के अनगिनत झूले।
कभी उसकी छाँव में
दोपहरें सुस्ताती थीं,
किसान अपनी पगड़ी उतारकर
धरती का हाल सुनाते थे,
बूढ़े किस्सों में
राजा-महाराजाओं को हराते थे,
और बच्चे उसकी जटाओं में
अपना आकाश तलाशते थे।
अब वहाँ एक बोर्ड लगा है—
“यहाँ शीघ्र ही
आधुनिक विकास परियोजना
प्रारंभ होगी।”
बरगद ने पढ़ा नहीं,
पर समझ गया।
विकास की भाषा में
पेड़ों के लिए
कोई जगह नहीं होती।
उसने देखा—
कल तक जो पगडंडी थी,
आज उस पर डामर बिछा है;
जिस खेत में अन्न उगता था,
वहाँ नक्शे उग रहे हैं;
जिस तालाब में
बच्चे अपना चेहरा देखते थे,
उसमें अब
कंक्रीट का चेहरा उतर आया है।
बरगद चुप रहा।
उसकी एक सूखी डाल से
एक पत्ता टूटा—
और धरती पर गिरते ही
ऐसा लगा
जैसे किसी बूढ़े किसान की
आँख से आँसू गिरा हो।
उसने देखा—
कुल्हाड़ी लेकर आए लोग
उसे पेड़ कहते थे,
पर उसकी छाँव में
पीढ़ियों ने जीवन जिया था।
उन्होंने उसकी जड़ों को
सिर्फ लकड़ी समझा,
उसने उनकी नसों में
बहती हुई हवा को बचाया था।
उन्होंने कहा—
“पुराना है, हटाना पड़ेगा।”
बरगद मुस्कराया—
“पुराना मैं नहीं,
तुम्हारी स्मृति हो रही है।”
फिर उसने अपनी जड़ों से
धरती को कसकर पकड़ा,
मानो पूछ रहा हो—
“क्या सचमुच विकास
मुझे काटकर ही आएगा?”
सड़क आगे बढ़ गई,
मशीनें आगे बढ़ गईं,
इमारतें आगे बढ़ गईं—
पर बरगद की छाया
पीछे छूट गई।
एक दिन
एक बच्चा वहाँ आया।
उसने न बोर्ड पढ़ा,
न नक्शा देखा,
बस मिट्टी को छुआ
और पूछा—
“दादा!
यहाँ कभी कोई पेड़ था क्या?”
बरगद काँप उठा।
उसकी सूखी जटाओं से
एक अदृश्य आँसू गिरा—
मिट्टी में समा गया।
उसी आँसू से
शायद कोई बीज फूटा।
क्योंकि प्रकृति
मरती नहीं,
वह अपने आँसुओं में
भविष्य छिपाकर रखती है।
और शायद किसी सुबह
वही बच्चा
एक नन्हा पौधा लगाकर कहेगा—
“विकास वह नहीं
जो छाँव छीन ले,
विकास वह है
जिसमें आने वाली पीढ़ियाँ
धूप से डरें नहीं।”
तब बरगद के आँसू
दुःख नहीं होंगे—
वे धरती की आँखों से निकली
एक नई हरियाली की
पहली बूँद होंगे।
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