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रफ्ता-रफ्ता

                
                                                         
                            यूं ही रफ्ता-रफ्ता,
                                                                 
                            
उम्र गुजर रही।
दोस्तों जरा रोको,
उम्रे रफ्तार को।
कहें रुक जाए,
ठहर जाए अभी।
जिंदगी जी ही नहीं है,
अभी हम जीना चाहते हैं।

यूं ही हम पीते रहे,
उम्र भर।
पर कमबख्त प्यास है,
कि बुझती नहीं।
अब कुछ देर और,
जी तो ले जरा।
नशे के घूंट,
पी तो ले जरा।
हम पीना चाहते हैं,
हम जीना चाहते हैं।

साखी भी है,
मयखाना भी है।
शाम भी है,
जाम भी है।
मीना भी है,
पैमाना भी है।
जाम उठाओ यारों,
आज ना रोको हमें।
हम पीना चाहते हैं,
हम जीना चाहते हैं।

कुछ बाकी रह गई,
अनसुनी बातें।
कुछ बाकी रह गई,
अनकही बातें।
कुछ कहना चाहते हैं,
पीते-पीते यूं ही,
उम्र तमाम हुई।
यूं ही जिंदगी की बातें,
सरेआम हुई।
अब उम्र को,
शिद्दत से जीना चाहते हैं।
हम पीना चाहते हैं,
हम जीना चाहते हैं।
हम पीना चाहते हैं,
हम जीना चाहते हैं.....
-लक्ष्मी कल्याण डम्माना
 
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3 महीने पहले

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