जब शून्य पड़ा था धरा-गगन में, कौन सृजन का स्वप्न सँजोता था?
कौन अँधेरे के आँगन में, नव-दीपक बनकर सोता था?
किसके कर में था शिल्प-विधान, किसकी प्रज्ञा थी कल्याणमयी—
वह विश्वकर्मा ही थे, जिनसे, सृष्टि हुई सौंदर्यमयी॥
पाषाणों में प्राण प्रतिष्ठित, धातु को गति प्रदान किया,
काष्ठ तराशा, भवन सँवारा, यंत्रों को विज्ञान दिया।
ईंट-ईंट में रूप उकेरा, कण-कण में आकार भरा,
निर्जीवों में जीवंत कला का, अनुपम तुमने संसार रचा॥
महल उठे तो नाम तुम्हारा, मंदिर सजे तो नाम तुम्हारा,
रथ दौड़े या यंत्र चले तो, उनमें श्रम का काम तुम्हारा।
गाँव की कुटिया से लेकर, नगरों के प्रासाद तलक,
तेरी कला की छाप मिली है, धरती के हर स्थान तलक॥
जिस हाथ में हथौड़ा चमके, उसमें तेरा तेज रहे,
जिस माथे से श्रम-बिंदु झरे, उसमें तेरा सेज रहे।
कारीगर की हर एक चोट में, तेरी शक्ति पुकारे है,
श्रमिक के खुरदुरे हाथों में, देवत्व आज भी सारे है॥
तूने सिखलाया—कर्म ही पूजा, श्रम ही सच्चा साधन है,
कौशल जब जनहित में लगे, तभी सफल जीवन है।
ज्ञान मिले तो गर्व न हो, विज्ञान बने वरदान,
ऐसा हो निर्माण हमारा, जिसका हो कल्याण॥
अब फिर कोई नव-शिल्प रचे, फिर कोई नव-आकार बने,
माटी से विज्ञान उठे और, नभ में नया संसार बने।
हर औजार बने सृजन-मंत्र, हर श्रम बने अभिनंदन,
विश्वकर्मा! तेरे चरणों में, शत-शत नमन, शत-वंदन॥
हे शिल्पाधिप! वर दो ऐसा—कर्म कभी निष्फल न हो,
मानव के हाथों से मानव का, कोई अहित निर्मित न हो।
ज्ञान, कला, विज्ञान मिलें और, मिटे जगत का अज्ञान—
तेरी कृपा से नित विकसित हो, मेरा भारत महान॥
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