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विरह का मौन

                
                                                         
                            निगाहें थक गईं मेरी, तुम्हारा रास्ता तकते,
                                                                 
                            
मगर ये अश्क आँखों के, नहीं अब भूलकर रुकते।
तुझे पाने की चाहत में, स्वयं को खो दिया मैंने,
मोहब्बत की कहानी को, अज़ब मोड़ दिया मैंने।
तड़पते दिल की आहों को, सुनाऊँ किस तरह तुमको,
जुदा होकर भी तुम मुझसे, भुला पाए नहीं मुझको।
ये कैसा मोड़ है लाया, मेरी इस सादगी का दिल,
मिली परछाईं यादों की, न तुम आए, न ही मंज़िल।
जलाकर इश्क़ की महफ़िल, धुआँ हम छोड़ आए हैं,
वियोग के इस समंदर में, सफ़ीना छोड़ आए हैं।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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