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ग़म-ए-जुदाई

                
                                                         
                            दिलों के दरमियां दूरी, मगर धड़कन में तुम ही हो,
                                                                 
                            
मेरी तन्हाई की महफ़िल, मेरे रोदन में तुम ही हो।
किताब-ए-इश्क़ का पन्ना, जो हमने खोलकर देखा,
जुदाई लिख गया था जो, उसी साए में तुम ही हो।
कभी जो ख़्वाब देखे थे, वो अब जागी हुई रातें,
सताती हैं बहुत अक्सर, तुम्हारी वो मधुर बातें।
तपिश इस विरह की दिल में, छुपाए फिर रहा हूँ मैं,
हँसी होठों पे है लेकिन, ये आँसू पी रहा हूँ मैं।
ज़माने को नहीं मालूम, जो दिल पर चोट खाई है,
मोहब्बत नाम है जिसका, वो बस अपनी विदाई है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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