॥ एक स्वप्न का सत्य ॥
देख मुझको मंद हँसती, आ रही थी मृत्यु पास,
छूटता संसार पूरा, टूटती जीवन की आस।
थामकर वो हाथ मेरा, ले चली उस पार को,
देखता ही रह गया मैं, रोते इस परिवार को।
माँ खड़ी व्याकुल बिलखती, बाह फैलाए मुझे,
बाप की आँखें पुकारें, किस तरफ़ ले जाए तुझे?
बहन की वो करुण चीखें, भाई का रोता बदन,
एक पल में ढह गया सब, छूटता हँसता भवन।
पूछना चाहा बहुत कुछ, पर न वाणी साथ दे,
काँपते होंठों से केवल, अश्रुओं की धार बह।
'चल समय पूरा हुआ अब', काल ने मुझसे कहा,
जो समेटा उम्र भर था, कुछ न अब मेरा रहा।
बेबसी में घुट रहा था, चीखना चाहा मगर,
छा रहा था आँखों आगे, एक वीराँ सा शहर।
तभी माथे पर पड़ा इक, स्नेहमय पावन सा हाथ,
'उठ भी जा अब भोर आई', पिता बोले मेरे साथ!
सपना था वो स्वास्तिक, खुल गईं आँखें मेरी,
ईश्वर तेरा शुक्रिया, जो टल गई आफ़त बड़ी!
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