रिमझिम की कोमल पदछापें
रिमझिम की कोमल पदछापों से,
जाग उठी धरती की मुस्कान।
सूखे अधरों पर हरियाली ने,
लिख दी फिर से जीवन-गान॥
बादल ने जब वीणा छेड़ी,
बूंदों ने स्वर में स्वर मिलाया।
पत्तों की थरथर कम्पन ने,
मानो कोई राग सुनाया॥
खेतों की माटी महक उठी,
जब बूंदों ने चूमा उसका भाल।
किसान-नयन में स्वप्न खिले,
ज्यों उषा में खिलता कमल विशाल॥
वन-पथ पर बिखरी निस्तब्धता,
बूंदों ने धीरे से तोड़ दी।
चिड़ियों के मौन कंठों में,
फिर से मधुर तान जोड़ दी॥
रिमझिम में स्मृतियाँ भी भीगें,
मन के आँगन झरने लगते।
बीते वर्षों के चित्र अचानक,
नयनों में फिर उतरने लगते॥
यह वर्षा का केवल आगमन नहीं,
यह नवजीवन का अभिनंदन है।
रिमझिम के प्रत्येक कण में,
सृष्टि का पावन स्पंदन है॥
जब तक धरती, गगन, दिशाएँ,
जब तक जीवन का संगीत रहेगा।
रिमझिम का यह मधुर निमंत्रण,
मानव-मन में सदैव बसेगा॥
-लारा उपाध्याय
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