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बाहर से तुम्हारी दो टूक

                
                                                         
                            कि तुम तो तुम हो,
                                                                 
                            
तुम्हें क्या खबर,
जीना भी मुझे ही,
मरना भी मुझे ही,
आँसू आए तो ,
मैं ही हथेली रखूं,
आँखों पर मोड़कर,
और दर्द हो,
तो मैं ही सीने पर रखूं हाथ,
बाहर से तुम्हारी दो टूक,
मैं ही सुनूं,
अंदर तक,
मैं ही फिर बुदबुदाऊं,
कि तुम तो,
कह दिए,
जहां में आने जाने को,
सवाल है कि,
मुझे ना निभाना आए,
इस ज़मीं पर,
तब मैं क्या करूं।।

- ललित दाधीच
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एक महीने पहले

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