ये मत देख कि मैं सफ़र में था,
और थक गया हूँ,
मुश्किलें लाख है मगर,
मंजिल को भूला नहीं हूँ,
कदम कदम पर मैं भी था ,
क़दम क़दम में तू भी था,
जिंदगी देखले मेरा तमाशा,
मंजिल को भी भूल गया हूं,
मंजिल को पाने के लिए,
जिंदगी देख मुझे मुसाफिर हूं,
और तुझे तड़पाकर जाऊंगा,
मौत तो दूसरा नाम भी नहीं रहने देती,
जिंदगी तुझे भी मंजिल तो मेरे नाम से ही मिलेगी।।
- ललित दाधीच
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