मैं वापस उसी मोड़ पर खड़ा हूं,
जहाँ से जिंदगी शुरू हुई है,
पहली जिंदगी में तो सहारा था,
दूसरी जिंदगी के लिए संकेत था,
पथ था गमन था व्यवहार था,
पर तीसरी जिंदगी में मुश्किल है,
कि सहारा नहीं ना कोई इशारा,
अब ये जिंदगी मेरी नींव है,
जहाँ मनुष्य शुरू होता है,
बनना बंधन स्वतंत्र बिगड़ना।
- ललित दाधीच
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