अब नहीं हूँ बेचैन,
कुछ पाया ही नहीं खोने को,
जिंदगी खुद जिंदगी चुराती है मेरी,
सुकून खुद कुबूल करता है,
सुकून नहीं है देने को,
मेरा अब है ही क्या,
जो मुझे मिला है,
दोस्त अब दुश्मनी भी पहट देखती है,
बस निकालने को मेरे खास शख्स के पास खुन्नस ही है।
- ललित दाधीच
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