फासले कब इश्क़-ए-उलफत में मोहब्बत की शिद्दत को कम करते हैं।
तुम मीलों दूर रहकर भी प्रत्येक क्षण हमारे क़रीब रहते हो।।
मुलाक़ात मुकम्मल न सही इश्क़-ए-इबादत में।
किन्तु ये तुम्हारे अधरों से लिपटी हुई अधूरी सी मोहब्बत को दिल से क़बूल करने की बात।
इस कायनात की हर मुकम्मल चीज़ से भी ख़ूबसूरत लगती है।।
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