इंतज़ार की हद हो गई जानिब।
'चराग-ए-दिल' भी बुझ चला इश्क़ -ए-इबादत में।।
अब तो कोई दीद की घड़ी मुक्करर कर दो।
मुकम्मल कब हुई है कोई मुलाक़ात इश्क़ में।।
तुम दूर से ही कोई अधूरी सी बात कहकर ये इश्क़ का पहला इंतज़ार मुक्कमल कर दो।
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