आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

"सुर-सम्राट गुरुदेव "

                
                                                         
                            मेरे गुरुदेव को
                                                                 
                            
गाना गाने का शौक था,
जब भी स्कूल में
कोई जलसा या
सांस्कृतिक प्रोग्राम होता था,
उनके गानों से सब
आहत हुआ करते थे,
पर वे श्रेष्ठ थे, वरिष्ठ थे,
उनकी अवहेलना
भला कौन कर सकता था।
वाद्य-यंत्र बनारस का रुख करता था
और गुरुदेव मगही रीति-लय की
तरफ निकल आते थे।
ताल-लय में कभी
नज़र नहीं आते थे,
सब गायकों के गाने
वे ही गाया करते थे।
रफी के गानों को
आस्था चैनल के भजन की
तर्ज पर गाया करते थे।
हम भागना चाहें तो
भाग नहीं सकते थे,
क्लास मॉनिटर की निगाहें
हम पर रहती थीं।
गाने एक नहीं,
दो-चार से कम नहीं
सुनने पड़ते थे।
कमाल की बात यह भी थी कि
वे लता, आशा
और अलका की आवाजों में
भी गा लेते थे।
"तुम्हीं मेरी मंदिर,
तुम्हीं मेरी पूजा,
तुम्हीं देवता हो"
गाने लगे,
सब छात्र-छात्राओं ने
गाने के बाद तालियाँ बजाईं
और पीछे से
दर्शकों और श्रोताओं ने
'वाह-वाह! क्या बात है'
कहकर शोर मचाया।
प्रोग्राम खत्म होते ही
लोगों ने गुरुदेव को
खूब प्रोत्साहित किया,
पर उनकी बीवी ने
उन्हें कह ही दिया -
"अपनी आवाज़ को रिकॉर्ड कर लीजिए
और खुद सुनकर
निर्णय कीजिए
कि आप कितने पानी में हैं?"
- लक्ष्मण झा परिमल,
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर