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उन दिनों कभी कार में

                
                                                         
                            उन दिनों कभी कार में ,
                                                                 
                            
चुपके से सीट के पीछे,
हाथ ले जाकर टटोलना,
तेरा मरमरी हाथ .. हवा में,
और अचानक छू जाना,
तेरी नाज़ुक ओ नर्म उंगलियों का,
जैसे मुकाम पा जाना हसरत का,
और दौड़ जाना जिस्म में तरंग का,
जैसे मिले रूह को राह,
इधर से उधर जाने की,
उनकी धड़कनों को छू जाने की,
उनकी आहों को सुन पाने की,
उनकी सिहरन से सिहर जाने की,
उनकी बंद पलकों में डूब जाने की,
उनके अंतर तक डूब जाने की,
दो जिस्म एक जान हो जाने की...
सब बैठे हैं कार में,
पर किसी को अंदाज़ भी नहीं,
दो दिलों में मचलती उमंगे,
सागर की लहरों सी तरंगें,
वो पीछे सीट से सटी हुई है,
नींद आ जाने का बहाना लिए,
पूरी दुनिया को धता बताते हुए,
अपनी दुनिया में खो जाते हुए,
धड़कनों को काबू में रखते हुए,
सांसों को संभालते हुए,
आहों को होंठों में दबाए,
छुअन की मिठास,
नज़दीकियों की तपिश,
सिर्फ हाथ से हाथ का मिलन,
जैसे आसमां में हों कदम,
जैसे प्रिय का आलिंगन,
जैसे बस इतने में ही पूरा हुआ संगम,
मन तृप्त, तन तृप्त,
प्रेम की अद्भुत परिभाषा,
किस किस तरह से हो जाए संतृप्त।।
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9 महीने पहले

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