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काश पर ही खतम

                
                                                         
                            काश से दिन शुरू काश पर ही खतम
                                                                 
                            
साथ चलता ही रहता ये जनमों

काश होता न ये काश होता ना वो,
काश हो जाता ये काश हो जाता वो,
काश मन से हमारे ये कह जाता है
मानो मन को भरम सा कुछ दे जाता है
ये है मन का कथन ये है मन का मनन
साथ चलता ही रहता ये जनमों जनम।

टूटे अरमानों की तुरपाई है काश,
ये मन से सिली बस ख्याली लिबास
ये है सच से परे बस मन खुश करे,
ये है कल्पित ज़मीं जहां अंबर मिले,
बन मन की कलम लिखे मन का वहम,
साथ चलता ही रहता ये जनमों जनम।

काश, कह देती वो, काश सुन लेता वो
काश, सुन लेती वो काश कह देता वो
कई रिश्ते काश के मोहताज हैं,
कई रिश्ते पहनाते उसे ताज हैं,
ये है मन का गढ़़न ये है मन की कुढ़न
साथ चलता ही रहता ये जनमों जनम।

काश, अनहोनी पर करे व्यंजना,
ये किस्मत लिखे पर करे रंजना,
रूठे किस्मत तो काश ही आस है
प्रश्न सा ये खड़ा कोई आभास है
ये मन को मनाने का करता जतन ,
साथ चलता ही रहता ये जनमों जनम।

नहीं शब्द है, काश, एहसास है
बुझ पाई नहीं,मन की वो प्यास है
ये हुए का मलाल ना हुए पर बवाल ,
काश मन की सभा में उठाता सवाल
काश, कहता ही रहता कदम दर कदम,
साथ चलता ही रहता ये जनमों जनम।
-श्वेता कुमारी
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एक वर्ष पहले

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