आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बस गुजरता हर नजारा

                
                                                         
                            ये गुजर या कि गुजारा,
                                                                 
                            
कहता है जीवन ये सारा,
जिंदगी की रहगुजर में,
बस गुजरता हर नज़ारा-

है, गुजर आसान कितना ,
जान कर ना जानते हैं
चंद खुशियों में खुशी है,
फिर भी क्या-क्या मांगते हैं,
है सफर आसान लेकिन,
लगता मुश्किल है किनारा
जिंदगी की रहगुजर में,
बस, गुजरता हर नज़ारा

चाहिए हमको ना ज्यादा,
मन ना माने चाहे ज्यादा,
मन का सागर प्यासा रहता,
और का रखता इरादा,
जो गुज़र भर की ही सोचे
खुशियों का छूटे फुहारा,
जिंदगी की रहगुजर में,
बस गुजरता है नजारा।

खाली मुट्ठी, खाली मिट्टी,
जिंदगी का सच यही है,
थोड़ा कड़वा है मगर ये,
शाश्वत और सत्य यही है,
बस गुजर जाना है इक दिन,
कहती है नदिया की धारा,
जिंदगी की रहगुजर में ,
बस, गुजरता हर नज़ारा।
श्वेता कुमारी,नई दिल्ली
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
9 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर