ये गुजर या कि गुजारा,
कहता है जीवन ये सारा,
जिंदगी की रहगुजर में,
बस गुजरता हर नज़ारा-
है, गुजर आसान कितना ,
जान कर ना जानते हैं
चंद खुशियों में खुशी है,
फिर भी क्या-क्या मांगते हैं,
है सफर आसान लेकिन,
लगता मुश्किल है किनारा
जिंदगी की रहगुजर में,
बस, गुजरता हर नज़ारा
चाहिए हमको ना ज्यादा,
मन ना माने चाहे ज्यादा,
मन का सागर प्यासा रहता,
और का रखता इरादा,
जो गुज़र भर की ही सोचे
खुशियों का छूटे फुहारा,
जिंदगी की रहगुजर में,
बस गुजरता है नजारा।
खाली मुट्ठी, खाली मिट्टी,
जिंदगी का सच यही है,
थोड़ा कड़वा है मगर ये,
शाश्वत और सत्य यही है,
बस गुजर जाना है इक दिन,
कहती है नदिया की धारा,
जिंदगी की रहगुजर में ,
बस, गुजरता हर नज़ारा।
श्वेता कुमारी,नई दिल्ली
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