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क्या कहु

                
                                                         
                            क्या कहु ,जब लफ़्ज़ सिमट जाते है,
                                                                 
                            
खामोशी की बाहों में।
एक सन्नाटा पसर जाता है आस पास।
और ढक देता है ,
प्रकृति की हंसी को भी।
और कुछ टूट जाता है,
उभर आती है तन्हाई।
वक्त के इस पड़ाव में
जिंदगी ही हो जाती है हरजाई।
बिखरते सपने और उजड़ती दुनिया,
कुछ यूं दिल पर सवार होती है।
दिल दबता सा जाता है,
न साँसे बहाल होती है।
ऐसे में ,क्या कहे,संभाले कैसे?
एक डूबती सी कस्ती को उबारे कैसे?
या छोड़ दे ?
समय पर, हर घाव भर जाता है।
मौसम कैसा भी हो ,
एक न एक दिन बदल जाता है।
फिर,ये दिल की आंधिया क्या टिक पाएंगे।
मंजर बदलेगा फिर शांति ही छाएगी।
ये अंधर ,ये तूफान,ये दो आँखों की बारिश,
एक दिन,
दिल बदलेगा और खामोशी भी छंट जाएगी।
समय के साथ फिर बहार भी छा जाएगी।
-कुमारी प्रियंका
 
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एक घंटा पहले

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