झूठ का वंदन यहाँ है
सत्य का क्रंदन यहाँ
हर तरफ़ है पेड़ कटते
अब कहाँ है वन यहाँ
झूठ का वंदन यहाँ है
सत्य का क्रन्दन यहाँ
खुश दिखते हम सभी हैं
सारे रिश्ते तोड़कर,
मरु निरंतर बढ़ रहा है
पानी सारा सोखकर
गर्म चलती हैं हवाएँ
अब यहाँ चंदन कहाँ
झूठ का वंदन यहाँ है
सत्य का क्रंदन यहाँ
भाव सारे मर गए हैं
स्वार्थ हैं जीवित मगर
गाँव की चौपालें टूटीं
अब जाएँ हम किधर
बढ़ गई कटुता बहुत है
इसका अब भंजन कहाँ
झूठ का वंदन यहाँ है
सत्य का क्रंदन यहाँ
- कुमार सर्वेश
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