जिन्दगी जीने का उद्देश्य,
जिन्हें मिला होगा वही जानें,
हम कल भी उत्तर ढूंढ रहे थे,
हम आज भी भटक रहे हैं।
आने वाले कल की उम्मीद में,
आज तक संघर्ष कर रहे हैं,
जीने के उद्देश्य का उत्तर,
हमें कभी मिले ना मिले।
नैतिक जिम्मेदारियों को,
ईमानदारी से निभा रहे हैं,
सभ्यता संस्कृति संस्कार को,
अपने जीवन में उतार रहे हैं।
पता नहीं प्रारब्ध जी रहे हैं,
ने कर्मों का हिसाब पा रहे हैं,
बिना उद्देश्य के भटके हुए,
जीवन को निकाल रहे हैं।
-कुलदीप शुक्ला
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