आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

दिल हल्का और रूह मेरी पाक है

                
                                                         
                            दिल हल्का है और रूह मेरी पाक है
                                                                 
                            

दिल हल्का है और रूह मेरी पाक है
ना कोई बोझ है ना कोई हिसाब है
खुद को खुद में ही समेट लिया है हमने
ना मांगा कोई हक है ना मांगा जवाब है

छोड़ दिया हमने तेरी खुशियों के लिए
मत निभा ये रिश्ता जबरदस्ती का
तेरा घर है तू नवाब है अपनी में फैसले का
मेरा तो फर्ज था जो दुनिया ने अनजाने में जोड़ा था
मर्जी तेरी है तू फैसला ले अपने मसाले का

चले जाएंगे बहुत दूर तेरी दरवाजे से ही नहीं
तेरी यादों के माहौल सी भी
इतना मजबूत बना लेंगे खुद को
की सोख लेंगे समुद्र की हिलोरों को भी

तू खुश रहना जिसके साथ रहे
दुआ करते हैं खुदा से यहीं
तेरी बरकत तेरे साथ रहे
खुशी अपने चेहरे पर बनाए रखना
हमें कम से कम इसी बात का तो सुकून रहे
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
47 मिनट पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर