सुना है दो राहों में से एक को चुनने की
कशमकश में,
खुद को ही भूल चुके हो तुम।
ऐसे तो नहीं थे पहले कभी
क्या से क्या बन गए हो तुम?
रायगानी एक राह से होनी तो दस्तूर में
लिखी थी!
इस सत्य को कब तक नकारोगे तुम?
इस मोड़ तक आना भी तो तुम्हारी ही ज़िद थी,
चुपचाप बैठकर भी तो जी सकते थे ना तुम ?
खैर एक राह पर चलने से
दूसरी राह से बैर होना तो मुनासिब है।
इस रायगानी का अंदाज़ा तो
बेशक शुरू से ही पता था तुम्हें
देखना बस इतना है,
इस बैर के बोझ को मन में छुपा कर
क्या जीवन भर चल सकोगे तुम?
और चलते-चलते फिर
क्या स्वयं को
ढूंढ़ सकोगे तुम ?
— कार्तिकेय सिंह चंदेल
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