ज़ख्मो को सहते-सहते आँखों में रेगिस्तान हो गया
मर कर भी शख्स मुझ पर कलंक का निशान हो गया
रूह तक छलनी हो गयी इतनी ठोकर खाई हमने
लहू से लतपथ ये जीवन जैसे कब्रिस्तान हो गया
जो तरस गया प्यार के लफ्ज़ को वो शख्श हूँ मैं
इश्क़ मुझ तक आते-आते कितना बेईमान हो गया
मैंने कहा था ख़ुदा से कोई तो बद्दुआ कुबूल कर
मुझे तड़पाने वाला शख्श, देख तालीबान हो गया
ना रास्तो ने कदर की ना मंजिल ने घूँघट हटाया
नाकामियाबी जैसे मुक़ददर का संविधान हो गया
एक सवाल जो बार-बार परेशान करता है "कृष्णा"
क्या मनहूसियत ही मेरे जीवन का गिरेबान हो गया
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