ये तेरे नयनों के सपनें,
क्यों लगते हैं सच ये अपनें?
ये तेरे नयनों के सपनें,
क्यों लगते हैं सच ये अपनें?।१।।
भांति -भांति अरमान पले हैं,
श्वासों संग अहसास चले हैं।
जलते बुझते दीप हैं जितनें,
क्यों लगते हैं सच ये अपनें?।२।।
जहां गये ये वहीं खिले हैं,
कुमुद बनें मृदुभाष मिले हैं।
नीर पंक के नीरज चिकनें,
क्यों लगते हैं सच ये अपनें?।३।।
सुख में दु:ख की याद कहां है,
धूप -छांव मरजाद कहां है।
खेल यहां खेला है किसनें,
क्यों लगते हैं सच ये अपनें?।४।।
पुष्प शूल संग विधा विधाता,
हस्त रेख क्यों कर के मिटाता।
चुना ख्वाब कंटकमय जितनें,
क्यों लगते हैं सच ये अपनें?।५।।
जब -जब तुझको याद किया है,
दिल ने ये फरियाद किया है।
टीस वही है, वही है तड़पनें,
क्यों लगते हैं सच ये अपनें?।६।।
सचमुच सपनें सच होने हैं,
ज्ञान बीज रच के बोने हैं।
नयी राग, नवगीत है रचनें,
क्यों लगते हैं सच ये अपनें?।७।।
अन्धकार को चीर चलो तुम,
निर्भय मन हो, सफल लखो तुम।
अनुपम तेज, अलौकिक सपनें,
क्यों लगते हैं सच ये अपनें?।८।।
-कृष्ण मुरारी पाण्डेय
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