सुनो कहानी उस रण की, जब धरती भी ललकार उठी ,
मेवाड़ी माटी के कण में, आज़ादी की अंगार उठी
मेवाड़ की माटी देख रही ,
यह युद्ध का एक तमाशा है
राणा तो रण करता है पर वह मान रक्त का प्यासा है ।
राणा अक्रोशित हुए शत्रु पर, तब ताल और मृदंग बजे ,
फिर राणा की तलवार उठी ,
बैरम खां के दो खंड हुए।
मातृभूमि की लाज बचाने
जिसने सुख को त्याग था,
मिट्टी के सम्मान की खातिर
शीश काटना चाहा था ,
जिसकी आँखों में आग रही, जिसके रक्तों में मान रहा,
वह राणा था प्रताप सिंह, जो खुद में हिंदुस्तान रहा!
वह राणा था—जो झुका नहीं!
वह ज्वाला था—जो बुझा नहीं!
वह सिंह था—जो रुका नहीं!
जो मातृभूमि से मुड़ा नहीं!
पर सुनो, कहानी केवल उनकी तलवारों की धार नहीं,
उस रण में एक अश्व भी था, जिसकी भी कोई मिसाल नहीं।
नाम था चेतक—नीला घोड़ा, बिजली सी रफ्तार लिया, राणा प्रताप के मान की खातिर, अपने को बलिदान किया
राणा की रक्षा के लिए, हर संकट से टकराता था,
मौत सामने खड़ी हो फिर भी, चेतक कदम बढ़ाता था
जहाँ पहाड़ भी राह रोकते, जहाँ हवा भी थम जाती,
चेतक की टापों की गर्जन से, धरती थर्रा जाती।
टाप नहीं थीं—तूफ़ान उठा था!
खुर नहीं थे—अभिमान उठा था!
चेतक जब रण में दौड़ पड़ा,
मानो मेवाड़ का प्राण उठा था!
हल्दीघाटी की धूल उठी, नभ पर केसरिया छाया था,
वीरों के लहू ने धरती को, रण का तिलक लगाया था
भालों की टंकार गूँज उठी, खड्गों ने कहर मचाया था,
मेवाड़ के वीरों ने रण में, शौर्य का परचम लहराया था।
उस रण में राणा अडिग खड़े थे, आँखों में अंगार लिए,
चेतक भी बढ़ता जाता था, सीने में हुंकार लिए।
शत्रु के चक्रव्यूह के आगे, दोनों थे दीवार बने,
एक था स्वामी, दूजा सेवक— दोनों ही तलवार बने।
रण की आँधी थमने लगी, पर संकट टला नहीं था,
राणा के माथे का सूरज,अब
भी ढला नहीं था।
घिरते शत्रु, बढ़ते संकट, और अनंत प्रहार हुआ
चेतक के खुर भी गरज उठे, रण में भीषण हुंकार हुआ।
न चेतक माँगेगा सिंहासन, न राणा देंगे ताज उसे,
इतिहास स्वयं झुककर देगा, अमरत्तो का सम्मान उसे।
न सोने की मूरत चाहिए, न पत्थर का उपहार हमें,
जब तक के वफ़ा की बात चलेगी, चेतक रहेगा याद हमें।
और राणा की बात निराली—सत्ता से बढ़कर मान रहा,
वन-वन भटके, कष्ट सहे, परंतु अटल स्वाभिमान रहा।
जब-जब कोई स्वाभिमान का मूल्य पूछना चाहेगा,
जब भी कोई वीरांग का इतिहास पूछना चाहेगा ,
जब-जब कोई वफ़ादारी का अर्थ समझना चाहेगा,
राणा-चेतक का नाम समय के पार सुनाई आएगा!
राणा की तलवार पुकारे, अन्याय से टकराना सीख,
घास की रोटी खाकर भी तू, अपना धर्म निभाना सीख,
रणभूमि में डटकर लड़ना और , विपदा में मुस्काना सीख, लाख बिछें बाधाएँ पथ में, फिर भी कदम बढ़ाना सीख।
,चेतक की टापें कहती हैं, तूफ़ानों से लड़ना सीख,
स्वाभिमान की रक्षा खातिर, अंगारों पर चलना सीख।
हल्दीघाटी की माटी बोले, वीरों-सा इतिहास तू लिख,
मातृभूमि के शान की खातिर , हँसकर प्राण लुटाना सीख!
हे प्रताप! तेरे त्याग के आगे, शब्द भी शीश झुकाएँगे,
तेरी वीरता के किस्से, सुनकर नयन भर आएँगे।
जब तक अरावली की घाटी पर सूरज सिंदूरी छाएगा,
भारत माता का हर बच्चा ,
जयघोष सदा दोहराएगा
राणा प्रताप की आन के लिए, चेतक ने हर घाव सहा,
मूक प्रेम की भाषा में,
स्वामी का हर दर्द सहा।
जब-जब राणा-चेतक की गाथा, इस धरती पर गाई जाएगी,
राणा की आँखें फिर नम होंगी, चेतक की याद रुलाएगी।
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