हम उस अँधेरी रात में सोये जा रहे है,
जहाँ न कोई ओर है, ना कोई अंत!
कभी अपनों के खातिर जिए जा रहे है,
आज हर तरह मिलावटी पिए जा रहे है !!
रोज आ रहे है, खींस्से कोई राजा कोई रंक
पिसे जा रहे है, रंक के कई अंश !
रोज बढ़ रहे, दानवता की कई कहानी
बोले तो मारा जाय, चुपचाप सह लो मेहरबानी !!
दानवता राज करे, इंसानों को मिले कालापानी
पाप कर्म आज धोये सब गंगा के बहता पानी !
शिक्षा की ओल -झोल में कहे पड़े है, जानी
जो रहा अच्छा है, जो होगा, वह मेहरबानी !!
कभी यदि जागो तुम सोच -समझ कर चलना जानी
पग -पग पर बैठे, सच्चे कर्म करें बखानी !
बड़े -बड़े पोस्टर छपे है, ज्ञान की लिखी कहानी
मौका मिले तो खां जाये, हाँथ पकड़ कर जानी !!
-क्रान्तिराज
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