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वक्त से एक मुलाक़ात

                
                                                         
                            वक्त से एक मुलाक़ात है ज़रूरी,
                                                                 
                            
खुद से भी एक बात है ज़रूरी।
जो मिल गया, उसे दिल से अपना लो,
जो खो गया, उसे मुस्कुराकर जाने दो।

हर मोड़ पर हर कोई अपना नहीं होता,
हर मुस्कान के पीछे सुकून नहीं होता।
कुछ लोग ज़िंदगी में सबक़ बनकर आते हैं,
हर रिश्ता मुकम्मल होना ज़रूरी नहीं होता।

कई ख़्वाब वक़्त की धूल में छिप जाते हैं,
कई अल्फ़ाज़ ख़ामोशी में सिमट जाते हैं।
मगर उम्मीद का दिया बुझने मत देना,
क्योंकि अँधेरे भी एक दिन सवेरा बन जाते हैं।

शिकायतों से सफ़र आसान नहीं होता,
माफ़ कर देना हार जाना नहीं होता।
जो चला गया, उसे दुआओँ में रहने दो,
जो साथ है, उसे दिल से निभाने दो।

वक्त से एक मुलाक़ात है ज़रूरी,
खुद से एक शुरुआत है ज़रूरी।
ज़िंदगी इंतज़ार से नहीं, हौसलों से चलती है,
हर सुबह फिर से मुस्कुराना ज़रूरी।
— कोमल 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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