अंतरमन में डूबा हुआ,
मन का किल्वा न जाने कब टूटेगा…
न जाने क्या निकलेगा,
न जाने क्या छूटेगा।
ये मन का ठहराव भी
एक भारी-सा बंधन है,
पर हर बंधन की तरह
एक रोज़ पिघलेगा,
एक रोज़ टूटेगा।
फिर धुंध छटेगी,
ख़ामोशियाँ बिखरेंगी,
और उसी राख से
एक नया सवेरा
फिर फूटेगा।
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