जला हुआ दिल हूँ मैं, मगर चराग़ अब भी हूँ,
शब-ए-ग़म की तीरगी में इक उजाला अब भी हूँ।
जिसे समझा था हमसफ़र, वही राह बदल गया,
मैं उसी मोड़ पर खड़ा, अपने वादों का अब भी हूँ।
ज़ख़्म इतने मिले कि दर्द भी ख़ामोश हो गया,
लब पे फिर भी सब्र है, दिल से ज़िंदा अब भी हूँ।
वक़्त ने हर मोड़ पर मेरी आज़माइशें लिखीं,
मैं मगर हर इम्तिहाँ में सरफ़राज़ अब भी हूँ।
जो मुझे ख़ाक समझकर हवा में उड़ गए,
उनकी नज़र से दूर सही, ख़ुद की नज़र में अब भी हूँ।
हौसले का कारवाँ मेरे साथ चलता रहा,
टूटा नहीं किसी मोड़ पर, बेख़ौफ़ अब भी हूँ।
— कोमल
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