देर रात के सूनेपन में,
देर रात के खालीपन में,
बात करनी थी तुमसे जो…
उस बात के अधूरेपन में…
देखा था जो ख़्वाब मिलकर हमने,
उन अनदेखे ख़्वाबों के सूनेपन में…
कुछ लफ़्ज़ थे जो कह न सके,
कुछ एहसास थे जो सह न सके,
कुछ पल थे जो ठहर गए,
कुछ रिश्ते थे जो बिखर गए…
आज भी चाँद से पूछती हूँ,
कहाँ खो गई वो रात हमारी,
जिसमें तुम थे, मैं थी,
और अधूरी-सी थी एक कहानी हमारी…
नींद आँखों से रूठ गई,
यादों ने फिर दस्तक दी,
तुमसे कहनी थी जो बात कभी,
वो आज भी दिल में ही रह गई…
- कोमल की कलम से
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