कोई अहसास नया नया सा है
ख़्वाबों का आसमां खुला खुला सा है
कोई सुकून कोई क़रार मिला है
जाने क्यों दिल खिला-खिला सा है
यूं लगा इंतजार खत्म हुआ आज
बुझा बुझा सा था जो दीप रोशनी से अब
समा धुला धुला सा है
मुरझा सा गया था बहारों में भी कोई एक फूल जो खिला-खिला सा है
जो कुछ खोया वह पाया पाया सा है
-किशन खराड़ी
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