अचंभित ना हो जान के कि जान की बाजी लगा रहे
ईटा पत्थर खाकर भी सब जीवन अपना बचा रहे
मिलावट की हुई बेशर्मी अब हवा पानी राशन तक
हर सामान है जहरीला लोग खाकर आयु घटा रहे
मजबूरी है लोगों की जो खाने पर मजबूर हुए
अन्न और पानी हवा तलक ये जहरीली बना रहे
ऐसी ललक लगी पैसे की ईमान न कोई धरम है
ये भी दुश्मन देश में हैं खाने में जहर मिला रहे
घर-घर में लोगों को बीमारी ने ऐसे घेर लिया
चक्व्यूह में सभी फंसे हैं सच-सच सब कुछ बता रहे
अब तो ऊपर वाला जाने आगे अभी भी क्या होगा
तरक्की की होड़ों में मानवता बेच के खा रहे
नहीं हृदय में दया मर्म है मिलावट इन खोरों के
बीच बाजार और ठेलों में विष की हाटें लगा रहे
बातें अपनी रखूँ कहाँ पर जहाँ हमें इंसाफ मिले
रसोई में सबके ही खाना शुद्ध और हवा रहे
कहे किरण मन बहुत द्रवित है उल्टे-पुल्टे लोगों से
कैसे निवाला खा लेते जिन हाथों जहर पिला रहे।
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