मैं बचपन की कुछ यादें सुनाऊँ,
अपने जीवन के अनमोल लम्हे दिखाऊँ।
खुला-खुला सा गाँवों का मंज़र,
लहराती नदियाँ, घने-घने जंगल।
लहराते बाग-बगीचे, इन्हीं के बीच,
छोटा-सा घर मेरा।
संगी-साथी, बहन भाई गाँव के सब,
यही हमारा संसार हुआ करता था।
उछलते-कूदते मीलों चलते-चलते,
दूसरे गाँव के बीच सुंदर छोटा सा स्कूल मेरा।
एक पहनावा , एक चटाई,
लड़का-लड़की भेद नहीं था।
दिल में छोटे-बड़े, अमीर-गरीब का मैल नहीं था।
हाथ में तख्ती और स्याही की डिबिया,
एक झोला सा संग बस्ता, चंद किताबें।
कभी हँसी, कभी आँसू,
कभी हम हँसते थे, कभी रोते थे।
कभी प्यार से, कभी मार से, कभी डर से काम होते।
कभी कोई कलम छुपाता, कभी पेन छुपाता,
पेन के ढेर नहीं, बस एक ही होता था।
टीचर से कितना प्यार था, समझ अब आता है,
वह प्यार नहीं ना दुलार करती थी
आज भी यादों में वो चेहरा कैसे बिसराऊं?
हिंदी ने बिंदी नहीं लगाई, गणित में हर गिनती।
टीचर मुंह जवानी सुनती ,
हमेशा कहती एक अगर भी हुई गलती ,
बीस पड़ेगी तुझको डंडी।
टीचर डाँट लगाती, सुनती, समझाती,
अगर एक भी हुई गलती,
बरस पड़ती डंडी।
समझ नहीं आया अब तक क्यों नहीं हुआ,
तब कोई भी हिसाब गलत।
याद नहीं कोई लम्हा , कोई दिन जब
टीचर ने मुझे मारा।
बहुत प्यारा बचपन था,
और बहुत प्यारा स्कूल हमारा।
-खष्टी सिजवाली
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