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खामोशी लबों की

                
                                                         
                            खामोशी लबों की तेरे सनम,
                                                                 
                            
क्या मेरा हाल कर गई...
आबाद थी जो कल तक,
वो जिंदगी बेहाल कर गई...

सोचता रहा मैं अब तक,
आएगा बन के तू हँसी मेरे लबों की ...
लेकिन आया तू बन के आंसू,
चेहरे को जो मेरे दाग दाग कर गई.....

कैसा था अज़ीब सा जादू,
ये बेदर्द मोहब्बत का तेरी...
सब्रनुमा थी कल तक जो आंखें,
उनको तू सैलाब सैलाब कर गई...

फैसला जो तू कभी अपना,
बदल ना सकी मेरे इश्क़ की खातिर...
हक़ीक़त ए चश्म को सनम तू भी,
ज़िन्दगी में ख्वाब-ख्वाब कर गई....

समझ ना सके कभी तुम भी,
मेरी चाहत की सरगमों को...
शायद यही हो गई वजह जो तू,
मेरे दिल की धुनों को तार-तार कर गई...

ना जाने कैसी थी कशिश वो जो,
रहती थी सनम निगाहों में तेरी...
एक बार ही छुआ था जिसने कभी दिल को ,
और छूते ही चिर के आर पार कर गई..."

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले

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