मिलते नहीं घरों में न मेरे घर आते हैं
यूँ दोस्त कई मुझसे अब आँख चुराते हैं.
सुनने को मेरी बातें कहने को सारी रातें
कुछ ख़्वाब रोज़ मिलने ख़्वाबों में बुलाते हैं.
आंधियों से चलके यूँ दिल्लगी भी कर लें
जो चराग़ बुझ गए हैं फिर उनको जलाते हैं.
गुम हो के भीड़ में कुछ तन्हाईयाँ चलती हैं
फ़ुर्सत में कभी आओ हम तुम को मिलाते हैं.
ख़ुश्क रेत हो या गीली ज़मीन 'ख़ालिद'
मेरे पीछे-पीछे मेरे सब नक़्शे-पा आते हैं.
- डॉ. ख़ालिद परवेज़
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