इंसान की हर उम्र में बदलती है चाहत की दास्ताँ,
बचपन में खिलौना, जवानी में माशूका, फिर रुतबा—आख़िर में ख़ुदा।
बचपन में मिट्टी के घर में भी महल बसते थे,
छोटी-सी खुशी में मिल जाता था पूरा जहाँ।
जवानी आई तो किसी के साथ की चाहत हुई,
एक चेहरे में दिखने लगा अपना सारा जहाँ।
फिर वक्त ने सिखाया—मोहब्बत से पेट नहीं भरता,
दौलत, नाम और रुतबे के पीछे भागा सारा जहाँ।
जिसे पाने की खातिर अपनों से भी दूर हो गए,
सब कुछ मिला, मगर दिल में रह गया एक खालीपन यहाँ।
कल तक जिस शख़्स को दुनिया अपनी मुट्ठी में लगती थी,
आज वही दो पल के सुकून को तरसता है यहाँ।
उम्र ढली तो समझ आया रिश्तों की कीमत है क्या,
दौलत साथ नहीं जाती, साथ चलती हैं बस दुआ।
आख़िर में न खिलौना चाहिए, न माशूका, न रुतबा,
थककर इंसान को चाहिए बस थोड़ा सुकून और ख़ुदा।
चाहतों का सिलसिला यूँ ही चलता रहा उम्रभर,
हर पड़ाव पर बदलता रहा इंसान का अपना जहाँ।
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