दिन भर जो मेरे संग-संग
बेवजह घिसटती रही.....
कभी सोचा है तुमने?
वो परछाई भी तो थकी होगी !
मैं तो चेहरे पर झूठी मुस्कानों का नक़ाब
ओढ़े फिरती रही......
वो कड़कती धूप में चुपचाप मेरे संग जलती होगी !
मैं जब-जब अपनी ही हक़ीक़त से
मुँह मोड़कर भागती रही.....
वो बे-ज़ुबाँ होकर भी
हर मोड़ पर, हर क़दम साथ चली।
ज़माने ने तो छोड़ दिया था
हर तरकश का तीर चलाकर.....
एक वही थी,
जो मेरी तन्हाई में भी साथ रही।
सब कहते हैं.....
"अंधेरा होते ही साया साथ छोड़ जाता है,"
मगर इस नादान ज़माने को
आख़िर कौन समझाए?
चराग़ बुझने पर वो
ओझल या रुख़सत नहीं होती.....
वो तो आगोश में भरकर...
मेरे भीतर ही सुस्ताने चली आए...
रौशनी का फ़रेब ही तो है...
जो हमें दो अलग वजूद दिखाता है,
अंधेरा तो वो आलिंगन है...
जो मुझ भटकी हुई को ख़ुद से मिलाता है।
जो पूरी उम्र मेरे आँसुओं की ख़ामोश गवाह बनी रही......
रात ढलते ही वो मेरे ही सीने से लगकर
सुकून से सो जाती है।
जिस दिन बुझेगी
ये आख़िरी शमा-ए-जिंदगी मेरी......
ना कोई रौशनी होगी,
ना कोई बिछड़ने का मलाल होगा.....
वो परछाई मुझमें इस कद्र मुकम्मल ढल जाएगी....
कि फिर ख़ुदा भी पूछेगा....
"बता, कौन साया थी और कौन लड़की?"
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