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अधूरी इच्छाएं

                
                                                         
                            अधूरी इच्छाओं का जाम साकी
                                                                 
                            
बड़ा ही निराला है....
मैंने कुछ घूंट पीकर देखा है 
क्या तुने भी पीकर देखा है?

लड़खड़ाते है कदम 
और मन बेचैन रहता है
बढ़ते है कदम मदिरालय की तरफ
मगर घर को पीछे खिसकते देखा है!

कभी शोक मनाते देखा..
कभी भाग्य का लिखा माना है 
बूँद-बूँद करके, टूटे जाम से भी 
पूरा जाम छलकाते देखा है!

खोने या पाने का ये खेल नहीं
सारा खेल जिम्मेदारी का....
ये खींचें डोर इच्छाओं की
फिर इच्छाओं को अधूरा देखा है!
-कविता श्री 
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3 महीने पहले

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