अभी मैं सफ़र में हूँ, कोई रस्ता गढ़ना होगा मुझे
कर्ज से दबे है कंधे मेरे, झुक कर चलना होगा मुझे
सुकून की आंँच पर, सेक कर खाई थी एक रोटी
अब हर एक निवाले को, अदा करना होगा मुझे
-कविता श्री
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