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गीत गगनागंना छंद

                
                                                         
                            ऊर्जा मिलती जब-जब लेता,नाम तुम्हारा।
                                                                 
                            
अधिकारों से वंचित हूँ प्रभु,बनो सहारा।।

मात-पिता आज्ञा पा जीवन ,बना हमारा ।
वन-वन घूमें सिया राम जो,अवध दुलारा।।
पूछो क्यों घर का भेदी बन,उम्र गुजारा
अधिकारों से वंचित हूँ प्रभु,बनो सहारा।।

भाई से विमुख खड़े है जो ,वही सिखाता
बाली मर कर बैकुंठ गया,हाय विधाता।।
अत्याचारी अंत समय में ,तुम्हें पुकारा।
अधिकारों से वंचित हूँ प्रभु,बनो सहारा।।

सिया हरण में मौन राम अब,धनुष उठाते।
जीत गए जग मर्यादा भी,हमें पढ़ाते।।
हनुमत प्रभु कहते राह तकूँ ,मुझे उबारा।
अधिकारों से वंचित हूँ प्रभु,बनो सहारा।।
-सूरज तिवारी
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2 महीने पहले

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