गीत
लिफ़ाफ़े में महकी वो सूखी कली
पुकारे तुम्हें दिल की सूनी गली
लिफ़ाफ़े में महकी वो सूखी कली
पुकारे तुम्हें दिल की सूनी गली
सताने लगी है तुम्हारी कमी अब
ये ख़त अनपढ़ा था, अनपढ़ा ही रहेगा
तुम्हारे बिना...
लिफ़ाफ़े में महकी वो सूखी कली...
यहाँ धूप आँगन में जमने लगी
परिंदों की आवाज़ थमने लगी
वो तुलसी का पौधा भी कुम्हला गया है
छतों पर जो पानी था, वो सूख गया है
घने बादलों का जो डेरा उठेगा
तो इस सूने घर में सवेरा उठेगा
मगर रौशनी से चुभन ही मिलेगी
ये सूनापन ठहरा है, ठहरा रहेगा
तुम्हारे बिना...
लिफ़ाफ़े में महकी वो सूखी कली...
नदी सूख कर रेत होने लगी
ये कश्ती भी खुद को डुबोने लगी
किनारों ने लहरों से मुँह मोड़ डाला
भँवर ने भी अपना भरम तोड़ डाला
दुआओं के धागे जो जलने लगे हैं
मुकद्दर के पासे भी ढलने लगे हैं
जमीं चीख कर आसमां से कहेगी
ये प्यास अधूरी थी, अधूरी रहेगी
तुम्हारे बिना...
लिफ़ाफ़े में महकी वो सूखी कली...
पुकारे तुम्हें दिल की सूनी गली...
-भानु शर्मा रंज
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